
आज इंसानियत का क़त्ल हुआ है,संकट के बादल छाए हैं,
हाथ पर हाथ धरे बैठे हम, कर कुछ भी न पाए हैं।
हैवान बने हैं मानव सारे, एक-दूजे की जान के प्यासे हैं,
इस समय, इस युग में थमती, मानवता की साँसें हैं।
पहलगाम में बिछ रही, सौहार्द की लाशें हैं,
फिर भी हो तुम कह रहे , हम अब भी खून के प्यासे हैं?
भाई-भाई का नाता टूटा, उठाई आज बंदूकें हैं ,
यूँ ही बढ़ता रहा तनाव तो, हर घर के आँगन सूखे हैं,
एक धागे में पिरोकर उन्होंने इंसान हमें बनाया है,
फिर क्यों इंसानियत पर विद्वंस के बादल छाए हैं?
ऐ आतंकी, शर्म करो,
कुछ शर्म करो, हाँ शर्म करो, कितनों को तुमने मारा है,
पर इस सब में क्या फ़ायदा तुम्हारा है?
दिल माँ भारती का है सहमा, क्यों तुमने उसे रुलाया है?
किस ख़ातिर तुमने अपनी माँ को खून के दाग़ों से नहलाया है?
कहाँ गई हया, कहाँ गई शर्म? क्या यही था वतन की खातिर
तुम्हारा नेक कर्म? दुनिया-जहान की अदालतों से
बच जाओगे, पर ख़ुदा की अदालत में,अपनी गवाही न दे पाओगे।
जंग का ऐलान हुआ है, कत्लेआम अब छाया है,
भारत हो या पाकिस्तान, दोनों में दुख और मातम छाया है।
संभल जा पाकिस्तान, वरना मिट्टी में मिल जाएगा,
पर भारत तू भी अपने वीर सपूतों को
मरने से बचा न पाएगा।
आतंक तो खत्म हो जाएगा,
पर उससे बचने वाला, रह कौन ही जाएगा?
जंग कोई एक जीत जाएगा, पर जीतकर भी कुछ न पाएगा,
क्योंकि जीत का जश्न मनाने को भी रह कौन जाएगा?
वो समा होगा जीत का, पर हो न सकेगा प्रीत का,
बर्बादी हर तरफ छाई होगी, और मानवता की लाश
किसी ने कंधे पर उठाई होगी।