
वैसे तो मैं हर रोज़ तुम्हें याद करता हूँ,
पर जब याद आती है वो रात मुझे तो मैं ये सोचा करता हूँ,
कि तुम्हारे जाने से फर्क तो न पड़ना था,
दुखी तो न होना था, ना बिल्कुल बेचैन होना, ना चुपके चुपके रोना था।
पर अब जब हम ने कहा है अलविदा, तब मेरी आँखें क्यों नम हैं।
जाना तो था ही एक दिन, कुछ जल्दी चले गए शायद इसका ग़म है।
पर फिर याद आता दिल में एक फ़रियाद थी,
जिस रात उठी वो फ़रियाद, वो रात भी बर्बाद थी।
थी तो वो बर्बाद पर, हँसने की बुनियाद थी, जीते जी मरते मरते भी, वो रात मुझे याद थी।
मिलना न चाहता अब तुमसे कि बहुत दर्द तुम्हारे दिल को दिए हैं,
पर क्या करूँ, जिंदगी के कितने मीठे पल मैंने तुम्हारे साथ जिए हैं।
मानो या न मानो तुम, एकतरफा ही सही, सच ही थी वो बातें जो मैंने उस रात तुमसे कहीं।
मानो के वो रात ख़ता हो, जिसने किया तुमसे हमें खफा हो।
खोया तुमने हमें नहीं जानम खोई तुमने वफ़ा हो।
काश के उस रात तुम्हारा चेहरा चाँद सा खिल जाता,
अलग हो जाने का डर तब न हम को बिल्कुल डराता।
पर क्या करें कि तुम्हें हमारे प्यार की कदर ही नहीं थी,
या शायद तुम्हें दिल की सच्ची फरियाद की पहचान ही नहीं थी।
अब हम क्या कर सकते हैं, बस जीवन भर प्यार करेंगे,
मिलने की आस में जिएंगे, ना मिलने पर ही मरेंगे।
पर मरते मरते तुम भी याद रखना, कोई तुम्हें भी चाहता था,
फर्क इतना था कि बस, उसका चाहना तुम्हें न भाता था।
लिखते रहेंगे हम हमेशा तुम्हें किरदार बनाकर,
हमेशा रखेंगे हम तुम्हें अपनी पलक़ों पर सजाकर।